ऋग्वेद (मंडल 7)
कस्तमि॑न्द्र॒ त्वाव॑सु॒मा मर्त्यो॑ दधर्षति । श्र॒द्धा इत्ते॑ मघव॒न्पार्ये॑ दि॒वि वा॒जी वाजं॑ सिषासति ॥ (१४)
हे इंद्र! जो व्यक्ति तुम्हारे मन में रहता है, उसे कौन आदमी दबा सकता है? हे धनस्वामी इंद्र! जो तुम्हारे प्रति श्रद्धालु होकर हवि देता है, वह स्वर्ग एवं भविष्य में अन्न पाता है. (१४)
O Indra! Who can suppress the person who lives in your mind? O Dhanaswami Indra! He who gives prayer to you, finds food in heaven and in the future. (14)