हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 7.33.2

मंडल 7 → सूक्त 33 → श्लोक 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 7)

ऋग्वेद: | सूक्त: 33
दू॒रादिन्द्र॑मनय॒न्ना सु॒तेन॑ ति॒रो वै॑श॒न्तमति॒ पान्त॑मु॒ग्रम् । पाश॑द्युम्नस्य वाय॒तस्य॒ सोमा॑त्सु॒तादिन्द्रो॑ऽवृणीता॒ वसि॑ष्ठान् ॥ (२)
वसिष्ठपुत्र वयत्सुत पाशद्युम्न का दूर से तिरस्कार करके चमस में भरे सोमरस को पीते हुए इंद्र को ले आए थे. इंद्र ने भी उसे छोड़कर सोमरस निचोड़ने वाले वसिष्ठपुत्रों को स्वीकार किया था. (२)
Vasishtaputra Vaytsut had brought Indra to Indra by drinking somras filled with spoons by despising Pasdyuman from a distance. Indra had also abandoned him and accepted the Vasishthaputras who had squeezed the Somras. (2)