हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 7.36.2

मंडल 7 → सूक्त 36 → श्लोक 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 7)

ऋग्वेद: | सूक्त: 36
इ॒मां वां॑ मित्रावरुणा सुवृ॒क्तिमिषं॒ न कृ॑ण्वे असुरा॒ नवी॑यः । इ॒नो वा॑म॒न्यः प॑द॒वीरद॑ब्धो॒ जनं॑ च मि॒त्रो य॑तति ब्रुवा॒णः ॥ (२)
हे शक्तिशाली मित्र एवं वरुण! मैं हव्यरूप अन्न के समान नवीन स्तुति तुम्हें सुनाता हू. तुम में एक वरुण सबके स्वामी, शत्रुओं द्वारा अपराजित एवं धर्माधर्म के निर्णायक हैं एवं दूसरे मित्र हमारी स्तुति सुनकर प्राणियों को अपने काम में लगाते हैं. (२)
O powerful friend and Varuna! I tell you a new praise like food. One of you, Varuna, is the master of all, undefeated by enemies and decisive of Dharmadharma and other friends listen to our praise and put the creatures in their work. (2)