हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 7.42.4

मंडल 7 → सूक्त 42 → श्लोक 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 7)

ऋग्वेद: | सूक्त: 42
य॒दा वी॒रस्य॑ रे॒वतो॑ दुरो॒णे स्यो॑न॒शीरति॑थिरा॒चिके॑तत् । सुप्री॑तो अ॒ग्निः सुधि॑तो॒ दम॒ आ स वि॒शे दा॑ति॒ वार्य॒मिय॑त्यै ॥ (४)
सबके अतिथि अग्नि जब वीर एवं धनी यजमान को घर में सुखपूर्वक सोए हुए जान पड़ते हैं तथा यज्ञशाला में भली प्रकार रखे हुए अन्ने प्रसन्न होते हैं, उस समय वे अपने समीप वाले लोगों को धन देते हैं. (४)
When the brave and rich host appears to be sleeping happily in the house and the well-kept people in the yajnashala, they give money to those near them. (4)