हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 7.44.4

मंडल 7 → सूक्त 44 → श्लोक 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 7)

ऋग्वेद: | सूक्त: 44
द॒धि॒क्रावा॑ प्रथ॒मो वा॒ज्यर्वाग्रे॒ रथा॑नां भवति प्रजा॒नन् । सं॒वि॒दा॒न उ॒षसा॒ सूर्ये॑णादि॒त्येभि॒र्वसु॑भि॒रङ्गि॑रोभिः ॥ (४)
सभी अश्वां में प्रमुख, शीघ्रगामी एवं गतिशील दधिक्रा जानने योग्य बातों को भली प्रकार जानकर उषा, सूर्य, आदित्यों, वसुओं और अंगिराओं के साथ सहमत होकर बैठते हैं. (४)
In all the horses, the chief, fast-moving and dynamic dyadiras, knowing the things that are well worth knowing, agree with usha, surya, adityas, vasus and angiras. (4)