ऋग्वेद (मंडल 7)
याः सूर्यो॑ र॒श्मिभि॑रात॒तान॒ याभ्य॒ इन्द्रो॒ अर॑दद्गा॒तुमू॒र्मिम् । ते सि॑न्धवो॒ वरि॑वो धातना नो यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः ॥ (४)
हे सिंधुरूप जलो! सूर्य अपनी किरणों द्वारा जिनका विस्तार करते हैं एवं जिनके लिए इंद्र ने गमनयोग्य मार्ग का उद्घाटन किया है, तुम वे ही हो. तुम हमारे लिए धन धारण करी. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (४)
O sindhurup jalo! What the sun expands by its rays and for whom Indra has opened the path of transit, you are the same. You held the money for us. Oh, God! You always protect us by means of welfare. (4)