हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 7.5.4

मंडल 7 → सूक्त 5 → श्लोक 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 7)

ऋग्वेद: | सूक्त: 5
तव॑ त्रि॒धातु॑ पृथि॒वी उ॒त द्यौर्वैश्वा॑नर व्र॒तम॑ग्ने सचन्त । त्वं भा॒सा रोद॑सी॒ आ त॑त॒न्थाज॑स्रेण शो॒चिषा॒ शोशु॑चानः ॥ (४)
हे वैश्वानर अग्नि! धरती, आकाश और स्वर्ग-तीनों तुम्हें प्यारा लगने वाला काम करते हैं. तुम नित्य तेज से दीप्तिमान होकर धरती-आकाश को विस्तृत करते हो. (४)
O global agni! Earth, sky, and heaven do what you love. You expand the earth and the sky by constantly shining brightly. (4)