ऋग्वेद (मंडल 7)
य आस्ते॒ यश्च॒ चर॑ति॒ यश्च॒ पश्य॑ति नो॒ जनः॑ । तेषां॒ सं ह॑न्मो अ॒क्षाणि॒ यथे॒दं ह॒र्म्यं तथा॑ ॥ (६)
जो हमारे प्रदेश में ठहरता है, चलता है अथवा हमें देखता है, हम उसकी आंखें फोड़ देते हैं. वह घर के समान शांत व निश्चल हो जाता है. (६)
Whoever dwells, walks, or sees us in our land, we break his eyes. He becomes as quiet and quiet as home. (6)