ऋग्वेद (मंडल 7)
ता भूरि॑पाशा॒वनृ॑तस्य॒ सेतू॑ दुर॒त्येतू॑ रि॒पवे॒ मर्त्या॑य । ऋ॒तस्य॑ मित्रावरुणा प॒था वा॑म॒पो न ना॒वा दु॑रि॒ता त॑रेम ॥ (३)
वे दोनों विपुल पाशों वाले, यज्ञ न करने वाले के बंधनकर्ता एवं शत्रु मनुष्य के लिए दुरतिक्रमणीय हैं. हे मित्र व वरुण! जिस प्रकार नाव के द्वारा जल को पार करते हैं, उसी प्रकार हम तुम्हारे यज्ञ द्वारा दुःखों से पार हो जावें. (३)
They are both dangerous for man with abundant loops, the bonder of the non-performing of yajna and the enemy. Oh my friend and Varun! Just as we cross the water by boat, let us overcome sufferings by your yajna. (3)