हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 7.83.2

मंडल 7 → सूक्त 83 → श्लोक 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 7)

ऋग्वेद: | सूक्त: 83
यत्रा॒ नरः॑ स॒मय॑न्ते कृ॒तध्व॑जो॒ यस्मि॑न्ना॒जा भव॑ति॒ किं च॒न प्रि॒यम् । यत्रा॒ भय॑न्ते॒ भुव॑ना स्व॒र्दृश॒स्तत्रा॑ न इन्द्रावरु॒णाधि॑ वोचतम् ॥ (२)
हे इंद्र एवं वरुण! उस युद्ध में तुम हमारे पक्षपात की बात करना, जिस में मनुष्य ध्वज उठाकर लड़ने के लिए मिलते हैं, जिस में कुछ भी प्रिय नहीं होता एवं प्राणी जिस में स्वर्ग के दर्शन करते हैं. (२)
O Indra and Varuna! You speak in our favor in a war in which men meet to fight by raising flags, in which nothing is beloved, and in which beings see heaven. (2)