ऋग्वेद (मंडल 7)
दा॒श॒रा॒ज्ञे परि॑यत्ताय वि॒श्वतः॑ सु॒दास॑ इन्द्रावरुणावशिक्षतम् । श्वि॒त्यञ्चो॒ यत्र॒ नम॑सा कप॒र्दिनो॑ धि॒या धीव॑न्तो॒ अस॑पन्त॒ तृत्स॑वः ॥ (८)
हे इंद्र एवं वरुण! जहां निर्मल, जटाधारी एवं यज्ञ-कर्म कर्त्ता तृत्सुओं ने हव्य अन्न एवं स्तुतियों से सेवा की, उसी दाशराज्ञ युद्ध में दस राजाओं द्वारा घिरे हुए सुदास को तुमने शक्तिशाली बनाया था. (८)
O Indra and Varuna! Where nirmal, jatadhari and yajna-karma kartas served with good food and praises, in the same Dasharagya war you made Sudas powerful, surrounded by the ten kings. (8)