ऋग्वेद (मंडल 7)
कृ॒तं नो॑ य॒ज्ञं वि॒दथे॑षु॒ चारुं॑ कृ॒तं ब्रह्मा॑णि सू॒रिषु॑ प्रश॒स्ता । उपो॑ र॒यिर्दे॒वजू॑तो न एतु॒ प्र णः॑ स्पा॒र्हाभि॑रू॒तिभि॑स्तिरेतम् ॥ (३)
हे इंद्र एवं वरुण! हमारे घरों में होने वाले यज्ञ को शोभन बनाओ एवं हमारे स्तोताओं की स्तुतियां उत्तम करो. तुम्हारे द्वारा प्रेरित धन हमारे पास आवे. तुम स्पृहणीय रक्षासाधनों द्वारा हमें बढ़ाओ. (३)
O Indra and Varuna! Make the yajna in our homes adorned and make the praises of our hymns good. May the money inspired by you come to us. You increase us by the means of invigorating defenses. (3)