हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद (मंडल 7)

ऋग्वेद: | सूक्त: 9
अबो॑धि जा॒र उ॒षसा॑मु॒पस्था॒द्धोता॑ म॒न्द्रः क॒वित॑मः पाव॒कः । दधा॑ति के॒तुमु॒भय॑स्य ज॒न्तोर्ह॒व्या दे॒वेषु॒ द्रवि॑णं सु॒कृत्सु॑ ॥ (१)
सब प्राणियों को पुराना बनाने वाले, देवों को बुलाने वाले, प्रसन्नरताकारक, अतिशय बुद्धिमान्‌ एवं शोधक अग्नि उषाओं के बीच जागते हैं. वे दो और चार पैरों वाले प्राणियों की पहचान, देवों में हव्य एवं शुभकर्म वाले यजमानों में धन धारण करते हैं. (१)
Those who make all beings old, those who call the gods, the cheerful, the most intelligent and the seekers, awaken among the agni usha. They identify beings with two and four legs, hold wealth in the gods and hosts of auspicious deeds. (1)

ऋग्वेद (मंडल 7)

ऋग्वेद: | सूक्त: 9
स सु॒क्रतु॒र्यो वि दुरः॑ पणी॒नां पु॑ना॒नो अ॒र्कं पु॑रु॒भोज॑सं नः । होता॑ म॒न्द्रो वि॒शां दमू॑नास्ति॒रस्तमो॑ ददृशे रा॒म्याणा॑म् ॥ (२)
जिन अग्नि ने पणियों के गायों के रोकने वाले द्वार खोले थे, वे ही शोभनकर्मा हैं. उन्होंने हमारे लिए अधिक दुधारू गायों का पूज्य-समूह खोजा था. देवों के बुलाने वाले, प्रसन्नताकारक एवं शांत मन वाले अग्ने रात्रि एवं यजमानों का अंधकार दूर करते हैं. (२)
The agni that opened the stop doors of the cows of the panais is Shobhankarma. They had found a revered group of more milch cows for us. The summoners of the gods, the happy ones and the calm-minded remove the darkness of the agne night and the hosts. (2)

ऋग्वेद (मंडल 7)

ऋग्वेद: | सूक्त: 9
अमू॑रः क॒विरदि॑तिर्वि॒वस्वा॑न्सुसं॒सन्मि॒त्रो अति॑थिः शि॒वो नः॑ । चि॒त्रभा॑नुरु॒षसां॑ भा॒त्यग्रे॒ऽपां गर्भः॑ प्र॒स्व१॒॑ आ वि॑वेश ॥ (३)
अमूढ, प्राज्ञ, दीनतारहित, दीप्तिशाली, शोभनगृह वाले, मित्र अतिथि एवं हमारा कल्याण करने वाले अग्नि विचित्र प्रकाश वाले बनकर प्रात:काल प्रकाशित होते हैं एवं जल के गर्भ के रूप में उत्पन्न होकर ओषधियों में प्रविष्ट होते हैं. (३)
The amudha, the pragya, the deities, the bright, the adorned, the friends, the guests and the agnis that do our well-being are illuminated in the morning as strange light and are born in the form of the womb of water and enter the herbs. (3)

ऋग्वेद (मंडल 7)

ऋग्वेद: | सूक्त: 9
ई॒ळेन्यो॑ वो॒ मनु॑षो यु॒गेषु॑ समन॒गा अ॑शुचज्जा॒तवे॑दाः । सु॒सं॒दृशा॑ भा॒नुना॒ यो वि॒भाति॒ प्रति॒ गावः॑ समिधा॒नं बु॑धन्त ॥ (४)
हे अग्नि! तुम यज्ञ के समय मनुष्यों द्वारा स्तुति के योग्य हो. जातवेद अग्नि युद्धों में सम्मिलित होकर चमकते हैं एवं किरणों द्वारा दर्शनयोग्य होते हैं. स्तुतियां प्रज्वलित अग्नि को जगाती हैं. (४)
O agni! You deserve praise by human beings at the time of yajna. The Jatavedas are involved in agni wars and shine and are visible by rays. Praises awaken the ignited agni. (4)

ऋग्वेद (मंडल 7)

ऋग्वेद: | सूक्त: 9
अग्ने॑ या॒हि दू॒त्यं१॒॑ मा रि॑षण्यो दे॒वाँ अच्छा॑ ब्रह्म॒कृता॑ ग॒णेन॑ । सर॑स्वतीं म॒रुतो॑ अ॒श्विना॒पो यक्षि॑ दे॒वान्र॑त्न॒धेया॑य॒ विश्वा॑न् ॥ (५)
हे अग्नि! तुम दूतकर्म करने के लिए देवों के समीप जाओ. स्तोताओं तथा उनके गणों की हिंसा मत करना. तुम हमें रत्न देने के लिए सरस्वती, मरुद्गण, अश्विनीकुमार, जल एवं अन्य देवों का यज्ञ करते हो. (५)
O agni! You go near to the gods to do angelic deeds. Don't do violence against the Psalms and their people. You perform the yajna of Saraswati, The Marudgana, Ashwinikumar, Jal and other gods to give us gems. (5)

ऋग्वेद (मंडल 7)

ऋग्वेद: | सूक्त: 9
त्वाम॑ग्ने समिधा॒नो वसि॑ष्ठो॒ जरू॑थं ह॒न्यक्षि॑ रा॒ये पुरं॑धिम् । पु॒रु॒णी॒था जा॑तवेदो जरस्व यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः ॥ (६)
हे अग्नि! वसिष्ठ ऋषि तुम्हें प्रज्वलित करते हैं. तुम राक्षसों की हत्या करो. हे जातवेद! तुम विशाल स्तोत्रं से देवों की स्तुति करो एवं कल्याणसाधनों द्वारा हमारी रक्षा करो. (६)
O agni! Vasishta Sage ignites you. You kill monsters. O Jathaveda! Praise the gods with huge hymns and protect us through means of welfare. (6)