हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 8.11.4

मंडल 8 → सूक्त 11 → श्लोक 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 11
अन्ति॑ चि॒त्सन्त॒मह॑ य॒ज्ञं मर्त॑स्य रि॒पोः । नोप॑ वेषि जातवेदः ॥ (४)
हे जातवेद अग्नि! तुम शत्रु के पास रहकर भी कभी उसके यज्ञ की इच्छा नहीं करते. (४)
O Jativeda Agni! You never wish to pray to the enemy even if you stay with him. (4)