हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 8.13.18

मंडल 8 → सूक्त 13 → श्लोक 18 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 13
त्रिक॑द्रुकेषु॒ चेत॑नं दे॒वासो॑ य॒ज्ञम॑त्नत । तमिद्व॑र्धन्तु नो॒ गिरः॑ स॒दावृ॑धम् ॥ (१८)
देवों ने त्रिकद्रुक नाम के यज्ञ में चैतन्य करने वाले इंद्र को यज्ञ के योग्य बनाया था. सदा बढ़ने वाले इंद्र को हमारी स्तुतियां बढ़ावें. (१८)
The devas had made Indra, who had performed consciousness in the yagna named Trikadruk, eligible for the yajna. Increase our praises to the ever-growing Indra. (18)