हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 8.2.35

मंडल 8 → सूक्त 2 → श्लोक 35 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 2
प्रभ॑र्ता॒ रथं॑ ग॒व्यन्त॑मपा॒काच्चि॒द्यमव॑ति । इ॒नो वसु॒ स हि वोळ्हा॑ ॥ (३५)
प्रहार करने वाले इंद्र जिस गतिशील एवं गाय की कामना करने वाले स्तोता को अपक्वबुद्धि वाले स्तोता के चक्कर से बचाते हैं, वह स्तोता धन का स्वामी बनकर हव्य वहन करता है. (३५)
The dynamic and cow-wishing hymn that the striking Indra saves from the whirlpool of the unspoken stota, the stota bears the havya by becoming the master of wealth. (35)