ऋग्वेद (मंडल 8)
उ॒त सु त्ये प॑यो॒वृधा॑ मा॒की रण॑स्य न॒प्त्या॑ । ज॒नि॒त्व॒नाय॑ मामहे ॥ (४२)
मैंने धन उत्पत्ति के लिए सर्वत्र प्रसिद्ध, जल बढ़ाने वाले, प्राणियों के निर्माता एवं स्तुतिकर्त्ता के प्रति दयालु द्यावा-पृथिवी की स्तुति की थी. (४२)
I had praised Dyava-Prithvi, all-famous everywhere for the creation of wealth, the water-enhancer, the creator of beings and the kind to the eulogist. (42)