ऋग्वेद (मंडल 8)
अ॒भ्रा॒तृ॒व्यो अ॒ना त्वमना॑पिरिन्द्र ज॒नुषा॑ स॒नाद॑सि । यु॒धेदा॑पि॒त्वमि॑च्छसे ॥ (१३)
हे इंद्र! तुम अपने जन्मकाल से ही भाइयों से हीन, बिना नेता वाले एवं बांधवहीन हो. तुम जो मित्रता चाहते हो, उसे युद्ध द्वारा प्राप्त करते हो. (१३)
O Indra! You have been inferior to your brothers since your birth, without leaders and without bondage. The friendship you seek, you get it through war. (13)