ऋग्वेद (मंडल 8)
तदि॒न्द्राव॒ आ भ॑र॒ येना॑ दंसिष्ठ॒ कृत्व॑ने । द्वि॒ता कुत्सा॑य शिश्नथो॒ नि चो॑दय ॥ (२५)
हे अत्यंत दर्शनीय इंद्र! हमें अपना आश्रय दो, जिससे हम यज्ञकर्म करने वाले यजमान की रक्षा कर सकें. तुमने दो तरह से कुत्स ऋषि की रक्षा की थी. उसी प्रकार हमारी भी रक्षा करो. (२५)
O very spectacular Indra! Give us your shelter, so that we can protect the host who performs the yajnakarma. You had protected the sage Kutsa in two ways. Similarly, protect us too. (25)