ऋग्वेद (मंडल 8)
यद॒दो दि॒वो अ॑र्ण॒व इ॒षो वा॒ मद॑थो गृ॒हे । श्रु॒तमिन्मे॑ अमर्त्या ॥ (१७)
हे मरणरहित अश्विनीकुमारो! तुम द्युलोक के नीचे इस सागर में अथवा तुम्हें चाहने वाले यजमान के घर में सुख से बैठे होओ. तुम हमारा यह स्तोत्र सुनो. (१७)
Oh, deathless Ashwinikumaro! You may be sitting happily in this sea under the dolok or in the house of the host who wants you. You listen to this hymn of ours. (17)