ऋग्वेद (मंडल 8)
प्र स क्षयं॑ तिरते॒ वि म॒हीरिषो॒ यो वो॒ वरा॑य॒ दाश॑ति । प्र प्र॒जाभि॑र्जायते॒ धर्म॑ण॒स्पर्यरि॑ष्टः॒ सर्व॑ एधते ॥ (१६)
हे देवो! वह मनुष्य अपना घर बढ़ाता है, जो वरणीय धन पाने के लिए तुम्हें हव्य देता है. वह अन्न वृद्धि करता है, प्रजाओं की वृद्धि करता है एवं तुम्हारे यज्ञकर्म के कारण अबाधित होकर बढ़ता है. (१६)
Oh, God! The man who grows his house, who gives you the opportunity to get the wealth you have. He increases the grain, increases the people and grows uninterrupted because of your sacrificial work. (16)