हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 8.41.6

मंडल 8 → सूक्त 41 → श्लोक 6 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 41
यस्मि॒न्विश्वा॑नि॒ काव्या॑ च॒क्रे नाभि॑रिव श्रि॒ता । त्रि॒तं जू॒ती स॑पर्यत व्र॒जे गावो॒ न सं॒युजे॑ यु॒जे अश्वा॑ँ अयुक्षत॒ नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे ॥ (६)
हे मेरे सेवको! तीन स्थानों में रहने वाले वरुण की शीघ्र सेवा करो. जिस प्रकार नाभि में पहिया स्थित रहता है उसी प्रकार सब काव्य वरुण में स्थित रहते हैं. जिस प्रकार गाय को गोशाला में ले जाते हैं, उसी प्रकार हमारे शत्रु घोड़ों को रथ में जोड़ते हैं. वरुण सब शत्रुओं को मारें. (६)
O my servants! Serve Varun, who lives in three places, quickly. Just as the wheel is located in the navel, all the poems are located in Varuna. Just as we take the cow to the goshala, so our enemies add horses to the chariot. Varuna kills all the enemies. (6)