हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 8.43.32

मंडल 8 → सूक्त 43 → श्लोक 32 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 43
स त्वम॑ग्ने वि॒भाव॑सुः सृ॒जन्सूर्यो॒ न र॒श्मिभिः॑ । शर्ध॒न्तमां॑सि जिघ्नसे ॥ (३२)
हे दीप्तिरूपी धन वाले अग्नि! तुम सूर्य के समान किरणों द्वारा अपनी शक्ति बढ़ाते हुए अंधकारों का नाश करते हो. (३२)
O agni with radiant wealth! You destroy darknesses by increasing your power by the same rays as the sun. (32)