हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 8.47.1

मंडल 8 → सूक्त 47 → श्लोक 1 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 47
महि॑ वो मह॒तामवो॒ वरु॑ण॒ मित्र॑ दा॒शुषे॑ । यमा॑दित्या अ॒भि द्रु॒हो रक्ष॑था॒ नेम॒घं न॑शदने॒हसो॑ व ऊ॒तयः॑ सुऊ॒तयो॑ व ऊ॒तयः॑ ॥ (१)
हे महान्‌ मित्र एवं वरुण! हवि देने वाले यजमान की तुम जो रक्षा करते हो, वह महान्‌ है. हे आदित्यो! तुम शत्रु के हाथ से जिस यजमान की रक्षा करते हो, उसे पाप नहीं छू सकता. तुम्हारी रक्षाएं उपद्रवरहित एवं शोभन हैं. (१)
Great friends and Varun! What you protect the host who gives the havi is great. Hey Aditya! Sin cannot touch the host you protect from the enemy's hand. Your defenses are hassle-free and benign. (1)