हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 8.50.11

मंडल 8 → सूक्त 50 → श्लोक 11 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 50
न पा॒पासो॑ मनामहे॒ नारा॑यासो॒ न जळ्ह॑वः । यदिन्न्विन्द्रं॒ वृष॑णं॒ सचा॑ सु॒ते सखा॑यं कृ॒णवा॑महै ॥ (११)
पुण्य न करने वाले हम इंद्र को नहीं मानते. धनरहित एवं अग्नि की उपासना करने वाले हम इंद्र को नहीं मानते. इस समय सोमरस निचुड़ जाने पर हम अभिलाषापूरक इंद्र को अपना मित्र बनाते हैं. (११)
We who do not do virtue do not believe in Indra. We do not believe in Indra, who is devoid of wealth and worships agni. At this time, when Someras is gone, we make The Blissful Indra our friend. (11)