हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 8.55.11

मंडल 8 → सूक्त 55 → श्लोक 11 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 55
व॒यं घा॑ ते॒ अपू॒र्व्येन्द्र॒ ब्रह्मा॑णि वृत्रहन् । पु॒रू॒तमा॑सः पुरुहूत वज्रिवो भृ॒तिं न प्र भ॑रामसि ॥ (११)
हे वृत्रहंता, बहुतों द्वारा बुलाए गए एवं वज्रधारी इंद्र! हम बहुत से लोग वेतन के समान तुम्हारे ही निमित्त नवीन स्तुतियां अर्पित करते हैं. (११)
O Vrithrahanta, indra called by many and thunderbolt! Many of us offer new praises to you as a salary. (11)