हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 8.55.13

मंडल 8 → सूक्त 55 → श्लोक 13 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 55
व॒यं घा॑ ते॒ त्वे इद्विन्द्र॒ विप्रा॒ अपि॑ ष्मसि । न॒हि त्वद॒न्यः पु॑रुहूत॒ कश्च॒न मघ॑व॒न्नस्ति॑ मर्डि॒ता ॥ (१३)
हे इंद्र! हम तुम्हारे ही हैं और तुम्हारी स्तुति करते हैं. हे बहुतों द्वारा बुलाए गए एवं धनस्वामी इंद्र! तुम्हारे अतिरिक्त कोई भी सुख देने वाला नहीं है. (१३)
O Indra! We are yours and praise you. O Indra, who has been called by many and riches! No one is going to give happiness except you. (13)