हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 8.59.10

मंडल 8 → सूक्त 59 → श्लोक 10 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 59
त्वं न॑ इन्द्र ऋत॒युस्त्वा॒निदो॒ नि तृ॑म्पसि । मध्ये॑ वसिष्व तुविनृम्णो॒र्वोर्नि दा॒सं शि॑श्नथो॒ हथैः॑ ॥ (१०)
हे यज्ञाभिलाषी इंद्र! तुम अपने निंदक का धन छीनकर बहुत प्रसन्न होते हो. हे अधिक धन वाले इंद्र! हमारी रक्षा के लिए तुम हमें अपनी दोनों जांघों के बीच छिपा लो एवं हमसे द्वेष करने वाले दासों को आयुधों द्वारा मारो. (१०)
O Yagyabhilashi Indra! You are very happy to take away the money of your slanderer. O Indra with more wealth! To protect us, hide us between your two thighs and kill the dasas who hate us with weapons. (10)