ऋग्वेद (मंडल 8)
त्रिक॑द्रुकेषु॒ चेत॑नं दे॒वासो॑ य॒ज्ञम॑त्नत । तमिद्व॑र्धन्तु नो॒ गिरः॑ ॥ (२१)
हे देवो! तुमने त्रिकद्रुक अर्थात् ज्योति, गौ और वायु पाने के लिए ज्ञानसाधन यज्ञ का विस्तार किया था. हमारी स्तुतियां उस यज्ञ को बढ़ावें. (२१)
Oh, God! You extended the Gyansadhan Yajna to get trikadruk i.e. jyoti, gau and vayu. May our praises enhance that sacrifice. (21)