ऋग्वेद (मंडल 8)
तमर्व॑न्तं॒ न सा॑न॒सिं गृ॑णी॒हि वि॑प्र शु॒ष्मिण॑म् । मि॒त्रं न या॑त॒यज्ज॑नम् ॥ (१२)
हे मेधावी स्तोता! तुम घोड़े के समान सेवा करने योग्य, शक्तिशाली एवं मित्र के समान शत्रुनाश करने वाले अग्नि की स्तुति करो. (१२)
This brilliant hymn! Praise the agni that serves like a horse, is powerful, and as a friend, you will destroy hate. (12)