ऋग्वेद (मंडल 9)
नाभा॒ नाभिं॑ न॒ आ द॑दे॒ चक्षु॑श्चि॒त्सूर्ये॒ सचा॑ । क॒वेरप॑त्य॒मा दु॑हे ॥ (८)
मैं नाभि के समान यज्ञ के आधार सोम को अपनी नाभि में धारण करता हूं. हमारी आंखें सूर्य से मिलती हैं. मैं कविरूप सोम की धाराओं को दुहता हूं. (८)
I hold the som in my navel, the basis of the yajna like the navel. Our eyes meet the sun. I milk the streams of Kavirup Som. (8)