ऋग्वेद (मंडल 9)
समे॑न॒मह्रु॑ता इ॒मा गिरो॑ अर्षन्ति स॒स्रुतः॑ । धे॒नूर्वा॒श्रो अ॑वीवशत् ॥ (६)
हमारी सरल स्तुतियां चलती हुई सोम के साथ मिलती हैं. शब्द करते हुए सोम उन प्रसन्न करने वाली स्तुतियों की अभिलाषा करते हैं. (६)
Our simple praises are mixed with the moving mon. While making the words, Som craves those pleasing praises. (6)