हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद (मंडल 9)

ऋग्वेद: | सूक्त: 51
अध्व॑र्यो॒ अद्रि॑भिः सु॒तं सोमं॑ प॒वित्र॒ आ सृ॑ज । पु॒नी॒हीन्द्रा॑य॒ पात॑वे ॥ (१)
हे अध्वर्युगण! पत्थरों की सहायता से पीसे हुए सोम को दशापवित्र पर डालो. तुम इसे इंद्र के पीने के लिए शुद्ध करो. (१)
O teacher! Put the crushed mon on the dashapavitra with the help of stones. You purify it for Indra's drink. (1)

ऋग्वेद (मंडल 9)

ऋग्वेद: | सूक्त: 51
दि॒वः पी॒यूष॑मुत्त॒मं सोम॒मिन्द्रा॑य व॒ज्रिणे॑ । सु॒नोता॒ मधु॑मत्तमम् ॥ (२)
हे अध्वर्युगण! अत्यधिक मधुर, स्वर्ग के अमृत के समान एवं उत्तम सोम को वञ्जधारी इंद्र के लिए निचोड़ो. (२)
O teacher! Squeeze the most sweet, the elixir of heaven and the perfect Soma for the vajjdhari Indra. (2)

ऋग्वेद (मंडल 9)

ऋग्वेद: | सूक्त: 51
तव॒ त्य इ॑न्दो॒ अन्ध॑सो दे॒वा मधो॒र्व्य॑श्नते । पव॑मानस्य म॒रुतः॑ ॥ (३)
हे सोम तुम्हारे निचुड़ते हुए एवं नशीले रस को इंद्रादि देव एवं मरुत्‌ प्राप्त करते हैं. (३)
O Soma, you receive your ing and intoxicating juices as indradi dev and marut. (3)

ऋग्वेद (मंडल 9)

ऋग्वेद: | सूक्त: 51
त्वं हि सो॑म व॒र्धय॑न्सु॒तो मदा॑य॒ भूर्ण॑ये । वृष॑न्स्तो॒तार॑मू॒तये॑ ॥ (४)
हे निचुड़े हुए सोम! तुम देवों को उन्नत बनाते हुए एवं अभिलाषाओं की पूर्ति करते हुए बुरंत नशा देने एवं रक्षा करने के लिए स्तोता के पास जाते हो. (४)
O unsettled Mon! You go to the stota to give intoxication and protection to the gods, upgrading them and fulfilling the desires. (4)

ऋग्वेद (मंडल 9)

ऋग्वेद: | सूक्त: 51
अ॒भ्य॑र्ष विचक्षण प॒वित्रं॒ धार॑या सु॒तः । अ॒भि वाज॑मु॒त श्रवः॑ ॥ (५)
हे विशेष बुद्धिमान्‌ सोम! तुम निचुड़कर दशापवित्र की ओर धारा के रूप में पहुंचो एवं हमारे लिए अन्न एवं कीर्ति दो. (५)
O specially wise Mon! You must reach the Dasapavitra as a stream and give us food and fame. (5)