ऋग्वेद (मंडल 9)
प्र ते॒ धारा॑ अस॒श्चतो॑ दि॒वो न य॑न्ति वृ॒ष्टयः॑ । अच्छा॒ वाजं॑ सह॒स्रिण॑म् ॥ (१)
हे सोम! जिस प्रकार द्युलोक से होने वाली जलवर्षा प्रजाओं को हजारों तरह का अन्न देती है, उसी प्रकार तुम्हारी आसक्तिरहित धाराएं हमें अन्न देती हैं. (१)
Hey Mon! Just as the water from The Dulok gives thousands of kinds of food to the people, so your unattached streams give us food. (1)