हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 9.69.2

मंडल 9 → सूक्त 69 → श्लोक 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 9)

ऋग्वेद: | सूक्त: 69
उपो॑ म॒तिः पृ॒च्यते॑ सि॒च्यते॒ मधु॑ म॒न्द्राज॑नी चोदते अ॒न्तरा॒सनि॑ । पव॑मानः संत॒निः प्र॑घ्न॒तामि॑व॒ मधु॑मान्द्र॒प्सः परि॒ वार॑मर्षति ॥ (२)
स्तोताओं द्वारा सोमरूप इंद्र की स्तुति की जाती है एवं इंद्र के निमित्त सोमरस में जल मिलाया जाता है. नशीले सोमरस की धारा इंद्र के मुख में पहुंचती है. जिस तरह मारने में कुशल योद्धाओं का बाण शीघ्र ही निशाने पर पहुंच जाता है, उसी प्रकार विस्तृत, मादक रस वाले, छनने वाले एवं शीघ्र गतिशील सोम भेड़ के बालों से बने दशापवित्र पर आते हैं. (२)
Somrup Indra is praised by the stotas and water is added to the Somras for the sake of Indra. The stream of intoxicating somras reaches indra's mouth. Just as the arrows of warriors skilled in killing quickly reach the target, so the wide, intoxicating, intoxicating, filtering and quickly moving Mon comes on the dashapavitra made of sheep's hair. (2)