ऋग्वेद (मंडल 9)
प्र कृ॑ष्टि॒हेव॑ शू॒ष ए॑ति॒ रोरु॑वदसु॒र्यं१॒॑ वर्णं॒ नि रि॑णीते अस्य॒ तम् । जहा॑ति व॒व्रिं पि॒तुरे॑ति निष्कृ॒तमु॑प॒प्रुतं॑ कृणुते नि॒र्णिजं॒ तना॑ ॥ (२)
शब्द करते हुए सोम शत्रुहननकर्तता योद्धा के समान जाते हैं एवं अपने असुर बाधक बल को प्रकट करते हैं. सोम बुढ़ापे का त्याग करते हैं तथा पीने योग्य द्रव्य के रूप में द्रोणकलश में जाते हैं. सोम भेड़ के बालों से बने दशापवित्र पर अपने गतिशील रूप को ठहराते हैं. (२)
While saying the word, Soma goes like a shatruhanankarta warrior and reveals his asura obstruction force. Soma renounces old age and goes to Dronakalash as a potable substance. Som rests his dynamic form on the dashapavitra made from sheep's hair. (2)