हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 9.85.10

मंडल 9 → सूक्त 85 → श्लोक 10 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 9)

ऋग्वेद: | सूक्त: 85
दि॒वो नाके॒ मधु॑जिह्वा अस॒श्चतो॑ वे॒ना दु॑हन्त्यु॒क्षणं॑ गिरि॒ष्ठाम् । अ॒प्सु द्र॒प्सं वा॑वृधा॒नं स॑मु॒द्र आ सिन्धो॑रू॒र्मा मधु॑मन्तं प॒वित्र॒ आ ॥ (१०)
मधुर वचन बोलने वाले वेनगोत्रीय ऋषि यज्ञ के हविर्धान नामक स्थान में अलग-अलग सोमरस निचोड़ते हैं एवं ऊंचे स्थान में स्थित जल बरसाने वाले, जल में बढ़ने वाले एवं रसरूप सोम को सागर के समान विशाल द्रोणकलश में जल की लहरों से सींचते हैं. वे मीठे रस वाले सोम को दशापवित्र में निचोड़ते हैं. (१०)
The Vengotriya sages who speak sweet words squeeze different somras in a place called The Havandhaan of yajna and water-pouring, rising in water and watering the rasarup som in the ocean-like giant dronakalash with waves of water. They squeeze the sweet-juiced mon into the dashapavitra. (10)