ऋग्वेद (मंडल 9)
वि॒प॒श्चिते॒ पव॑मानाय गायत म॒ही न धारात्यन्धो॑ अर्षति । अहि॒र्न जू॒र्णामति॑ सर्पति॒ त्वच॒मत्यो॒ न क्रीळ॑न्नसर॒द्वृषा॒ हरिः॑ ॥ (४४)
हे ऋत्विजो! विद्वान् एवं शुद्ध होते हुए सोम के लिए स्तुतियां गाओ. जिस प्रकार वर्षा की विशाल-धारा बाधा को पार करके आगे बढ़ती है, उसी प्रकार सोम रसरूपी अन्न को लांघकर आगे बढ़ते हैं. सांप जिस प्रकार अपनी केंचुली छोड़ता है, उसी प्रकार सोम का रस अपनी लता को छोड़ता है. वर्षा करने वाले व हरितवर्ण सोम घोड़े के समान क्रीड़ा करते हुए दशापवित्र से द्रोणकलश में जाते हैं. (४४)
Hey Ritvijo! Sing praises to Mon while being learned and pure. Just as the huge stream of rain crosses the barrier and moves forward, so the soma rasarupi move forward by crossing the grain. Just as the snake leaves its earthworm, so much soma juice leaves its creeper. The rainy and green-coloured Som goes from Dashapavittra to Dronakalash, playing like a horse. (44)