हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 9.91.1

मंडल 9 → सूक्त 91 → श्लोक 1 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 9)

ऋग्वेद: | सूक्त: 91
अस॑र्जि॒ वक्वा॒ रथ्ये॒ यथा॒जौ धि॒या म॒नोता॑ प्रथ॒मो म॑नी॒षी । दश॒ स्वसा॑रो॒ अधि॒ सानो॒ अव्येऽज॑न्ति॒ वह्निं॒ सद॑ना॒न्यच्छ॑ ॥ (१)
युद्धभूमि में जैसे घोड़े की मालिश की जाती है, उसी प्रकार यज्ञ में शब्द करने वाले, देवों के मनचाहे, देवों में श्रेष्ठ एवं स्तुतियों के स्वामी सोम स्लुतियों के साथ निर्मित किए जाते हैं. सगी बहिनों के समान दस उंगलियां यज्ञशाला की ओर फल ढोने वाले सोम को भेड़ों के बालों से बने दशापवित्र रूपी ऊंचे स्थान की ओर प्रेरित करती हैं. (१)
Just as the horse is massaged in the battlefield, so the words in the yajna, the ones who desire the gods, the best of the gods, and the masters of the praises are made with the som slutis. Like the sisters, ten fingers drive the fruit-carrying Som towards the yajnashala towards the high place of Dashapavitra made of sheep's hair. (1)