सामवेद (अध्याय 12)
इन्द्राय साम गायत विप्राय बृहते बृहत् । ब्रह्माकृते विपश्चिते पनस्यवे ॥ (४)
हे साम गायक ब्राह्मणो! इंद्र प्रशंसा के योग्य हैं. आप उन के लिए विस्तृत साममंत्र गाइए. इंद्र ज्ञानसाधक व उस के विस्तारक हैं. (४)
O Saam singer Brahmins! Indra deserves praise. You sing elaborate samantras for them. Indra is a knowledge seeker and an extension of it. (4)