सामवेद (अध्याय 2)
उदु त्ये सूनवो गिरः काष्ठा यज्ञेष्वत्नत । वाश्रा अभिज्ञु यातवे ॥ (८)
प्रसिद्ध गर्जना करते हुए मरुत् देवता यज्ञ में जल के समान फैलते हैं. जल का विस्तार करते हैं. उस जल को पीने के लिए र॑भाती हुई गायों के समूह को घुटनों तक के पानी से जाना पड़ता है. (८)
While roaring famously, the deserted deity spreads like water in the yagna. Expand water. To drink that water, a group of cows have to go with knee-deep water. (8)