सामवेद (अध्याय 2)
आ याह्युप नः सुतं वाजेभिर्मा हृणीयथाः । महाँ इव युवजानिः ॥ (५)
हे इंद्र! जिस प्रकार युवा स्त्री (पत्नी) वाला पुरुष किसी दूसरी स्त्री पर नजर नहीं डालता, उसी प्रकार आप भी औरों की हवि पर नजर मत डालिए (मत ललचाइए). आप हमारे ही सोम यज्ञ में पधार कर हवि ग्रहण करने की कृपा करें. (५)
O Indra! Just as a man with a young woman (wife) does not look at another woman, so don't look at the desires of others (don't tempt). Please come to our own Soma Yagya and accept Havi. (5)