सामवेद (अध्याय 20)
अजीजनो अमृत मर्त्याय अमृतस्य धर्मन्नमृतस्य चारुणः । सदासरो वाजमच्छा सनिष्यदत् ॥ (६)
हे सोम! आप अमृतमय हैं. आप मनुष्यों के लिए सत्य और मंगलकारी तत्त्व धारण करते हैं. आप ने सूर्य को प्रकट किया, देवगण की सेवा की और सदैव यजमानों को अन्न, धन देने हेतु लालायित रहते हैं. (६)
O Mon! You are nectar. You possess true and auspicious elements for human beings. You have revealed the sun, served the gods and are always eager to give food and money to the hosts. (6)