हरि ॐ

सामवेद (Samved)

सामवेद 26.4.1

अध्याय 26 → खंड 4 → मंत्र 1 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

सामवेद (अध्याय 26)

सामवेद: | खंड: 4
प्रो ष्वस्मै पुरोरथमिन्द्राय शूषमर्चत । अभीके चिदु लोककृत्सङ्गे समत्सु वृत्रह । अस्माकं बोधि चोदिता नभन्तामन्यकेषां ज्याका अधि धन्वसु ॥ (१)
हे यजमानो! आप इंद्र के रथ के सामने उपासना करिए. आप शक्ति की उपासना कीजिए. इंद्र संसार के पालक, वृत्रहंता व प्रेरक हैं. हमारी हार्दिक इच्छा है कि हमारे शत्रुओं के धनुष की प्रत्यंचा टूट जाए. (१)
O hosts! You worship in front of Indra's chariot. You worship Shakti. Indra is the guardian, greater and motivator of the world. It is our heartfelt wish that the bow of our enemies should be broken. (1)