सामवेद (अध्याय 26)
अग्ने तव श्रवो वयो महि भ्राजन्ते अर्चयो विभावसो । बृहद्भानो शवसा वाजमुक्थ्य३ं दधासि दाशुषे कवे ॥ (४)
हे अग्नि! आप की हवि सराहनीय है. आप कवि (विद्वान्) और प्रकाशमान हैं. आप की विशाल लपटें सुशोभित होती हैं. आप यजमानों को धन देते हैं. (४)
O agni! Your desire is commendable. You are a poet (scholar) and a shining light. Your huge flames are adorned. You give money to the hosts. (4)