हरि ॐ

सामवेद (Samved)

सामवेद 26.7.11

अध्याय 26 → खंड 7 → मंत्र 11 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

सामवेद (अध्याय 26)

सामवेद: | खंड: 7
अप्सु रेतः शिश्रिये विश्वरूपं तेजः पृथिव्यामधि यत्सम्बभूव । अन्तरिक्षे स्वं महिमानं मिमानः कनिक्रन्ति वृष्णो अश्वस्य रेतः ॥ (११)
हे अग्नि! आप का वीर्य घोड़े के वीर्य की तरह है, विश्वरूप है, तेजोमय है, जल में (बादल रूप में) आश्रय पाता है, पृथ्वी पर जीवन शक्ति के रूप में है. अंतरिक्ष में अपनी व्यापक महिमा को फैलाए हुए है. वह सर्वत्र अपनी व्यापकता लिए हुए है. (११)
O agni! Your semen is like horse semen, is universal, is sharp, finds shelter in water (in cloud form), is as vitality on earth. Spread its wide glory in space. He has his vastness everywhere. (11)