हरि ॐ

सामवेद (Samved)

सामवेद 26.7.13

अध्याय 26 → खंड 7 → मंत्र 13 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

सामवेद (अध्याय 26)

सामवेद: | खंड: 7
नाके सुपर्णमुप यत्पतन्तँ हृदा वेनन्तो अभ्यचक्षत त्वा । हिरण्यपक्षं वरुणस्य दूतं यमस्य योनौ शकुनं भुरण्युम् ॥ (१३)
हे वेन! उपासक आप को हृदय से पाने की इच्छा करते हैं. इस इच्छा से वे ऊपर देखते हैं. तब वे आप को अंतरिक्षलोक में अग्नि (विद्युत्‌ रूपधारी) के पास पाते हैं. आप वरुण के दूत हैं, सोने के पंखों वाले हैं, यम की योनि में हैं व विश्व का भरणपोषण करने वाले हैं. (१३)
Hey Wayne! Worshippers desire to get you from the heart. With this desire they look up. Then they find you near agni (electric form) in the space world. You are the messenger of Varuna, with gold wings, in yama's vagina and you are the one who feeds the world. (13)