हरि ॐ

सामवेद (Samved)

सामवेद 3.10.1

अध्याय 3 → खंड 10 → मंत्र 1 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

सामवेद (अध्याय 3)

सामवेद: | खंड: 10
अव द्रप्सो अँशुमतीमतिष्ठदीयानः कृष्णो दशभिः सहस्रैः । आवत्तमिन्द्रः शच्या धमन्तमप स्नीहितिं नृमणा अधद्राः ॥ (१)
इंद्र सभी को प्रिय हैं. उन्होंने शत्रुओं द्वारा आक्रमण किए जाने पर उन पर फिर से आक्रमण कर के उन की सेना को हरा दिया. उन्होंने कृष्णासुर को भी हराया. कृष्णासुर बहुत तीब्र गति वाला था. उस ने दस हजार सैनिकों को साथ ले कर उन पर हमला किया था. कृष्णासुर सभी के लिए दुःखदायक था. अंशुमती (नदी) के तट पर उस ने सभी को (आकृष्ट कर के) अपने चंगुल में फंसा लिया था. उन्होंने इतने शक्तिमान कृष्णासुर को भी हरा दिया. (१)
Indra is dear to all. When attacked by the enemies, he attacked them again and defeated his army. He also defeated Krishnasur. Krishnasur was very sharp. He took ten thousand soldiers along and attacked them. Krishnasur was sad for everyone. On the banks of the Anshumati (river), he had trapped everyone (by attracting) in his clutches. He also defeated so powerful Krishnasur. (1)