सामवेद (अध्याय 4)
अग्निँ होतारं मन्ये दास्वन्तं वसोः सूनुँ सहसो जातवेदसं विप्रं न जातवेदसम् । य ऊर्ध्वया स्वध्वरो देवो देवाच्या कृपा । घृतस्य विभ्राष्टिमनु शुक्रशोचिष आजुह्वानस्य सर्पिषः ॥ (९)
हे अग्नि! आप को हम होता मानते हैं. हम आप के दास हैं. आप धनदाता, ज्ञानदाता व सर्वज्ञाता हैं. आप जैसे सर्वज्ञाता और ब्राह्मण को हम आहुति प्रदान करते हैं. हम अपने यज्ञ में ऊर्ध्व (ऊंचे) लोकों में रहने वाले देवों की कृपा चाहते हैं. पवित्र और प्रकाशमान आप को हम घी की आहुति भेंट करते हैं. आप प्रसन्न होइए. (९)
O agni! You believe we would. We are your slaves. You are a wealth giver, a giver of knowledge and an omniscient. We offer sacrifices to omniscient and Brahmins like you. We want the grace of the gods living in the upper (higher) worlds in our yajna. We offer ghee to you, holy and bright. Please be happy. (9)