सामवेद (अध्याय 5)
यस्ते मदो वरेण्यस्तेना पवस्वान्धसा । देवावीरघशँसहा ॥ (४)
हे सोम! आप का रस देवताओं को बहुत प्रिय, राक्षसों का नाशक है. आप का रस बहुत प्रसन्नतादायी है. आप इस रस के साथ कलशों (मटकों) में पधारिए. (४)
O Mon! Your juice is very dear to the gods, the destroyer of demons. Your juice is very pleasing. You come to the urns (matkas) with this juice. (4)